आज के डिजिटल युग में भी चेक भुगतान का एक महत्वपूर्ण माध्यम बना हुआ है। व्यापारिक लेन-देन से लेकर व्यक्तिगत भुगतान तक, चेक का उपयोग व्यापक रूप से होता है। लेकिन जब कोई चेक बाउंस हो जाता है, तो यह न केवल लेनदार के लिए परेशानी का कारण बनता है, बल्कि कानूनी कार्रवाई का विषय भी बन सकता है। भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) और बैंकिंग प्रणाली ने चेक बाउंस की समस्या को गंभीरता से लेते हुए कई नियम और दिशानिर्देश जारी किए हैं।
चेक बाउंस क्या होता है?
चेक बाउंस या चेक डिसऑनर तब होता है जब बैंक किसी चेक का भुगतान करने से इनकार कर देता है। इसके कई कारण हो सकते हैं जैसे खाते में अपर्याप्त धनराशि, हस्ताक्षर में बेमेल, चेक की वैधता समाप्त होना, या खाता बंद होना। चेक बाउंस होने पर बैंक एक ‘चेक रिटर्न मेमो’ जारी करता है जिसमें बाउंस होने का कारण लिखा होता है।
RBI के नए दिशानिर्देश
भारतीय रिजर्व बैंक ने चेक क्लियरिंग प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी और कुशल बनाने के लिए समय-समय पर दिशानिर्देश जारी किए हैं। RBI ने बैंकों को निर्देश दिया है कि वे चेक बाउंस होने की स्थिति में तुरंत चेक जारीकर्ता और प्राप्तकर्ता दोनों को एसएमएस और ईमेल के माध्यम से सूचित करें।
RBI के अनुसार, बैंकों को चेक बाउंस के सभी मामलों में स्पष्ट कारण बताना अनिवार्य है। साथ ही, ग्राहकों को यह सुविधा दी गई है कि वे चेक की स्थिति को ऑनलाइन ट्रैक कर सकें। इससे पारदर्शिता बढ़ी है और ग्राहकों को समय पर जानकारी मिलने लगी है।
चेक बाउंस के कानूनी प्रावधान
चेक बाउंस को भारतीय कानून में एक गंभीर अपराध माना जाता है। नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट, 1881 की धारा 138 के तहत चेक बाउंस करना दंडनीय अपराध है। यह धारा उन मामलों पर लागू होती है जहां किसी व्यक्ति ने किसी ऋण या देनदारी के भुगतान के लिए चेक दिया हो।
धारा 138 के तहत शर्तें
चेक बाउंस के मामले में कानूनी कार्रवाई तभी संभव है जब निम्नलिखित शर्तें पूरी हों:
पहली शर्त: चेक किसी कानूनी देनदारी या ऋण के भुगतान के लिए दिया गया हो।
दूसरी शर्त: चेक खाते में अपर्याप्त राशि या किसी अन्य कारण से बाउंस हुआ हो।
तीसरी शर्त: चेक धारक ने चेक बाउंस होने के 30 दिनों के भीतर चेक जारीकर्ता को लिखित नोटिस भेजा हो।
चौथी शर्त: चेक जारीकर्ता ने नोटिस प्राप्त होने के 15 दिनों के भीतर भुगतान नहीं किया हो।
चेक बाउंस की सजा
नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट की धारा 138 के तहत चेक बाउंस करने पर निम्नलिखित सजा का प्रावधान है:
कारावास: अपराधी को दो साल तक की कैद की सजा हो सकती है।
जुर्माना: चेक की राशि का दोगुना जुर्माना लगाया जा सकता है।
दोनों: कारावास और जुर्माना दोनों एक साथ भी हो सकते हैं।
यह ध्यान देने योग्य है कि यह एक संज्ञेय अपराध है और समझौता योग्य भी है। अदालत के समक्ष दोनों पक्ष आपसी सहमति से मामले का निपटारा कर सकते हैं।
चेक बाउंस के मामले में कानूनी प्रक्रिया
जब कोई चेक बाउंस होता है, तो पीड़ित पक्ष को निम्नलिखित कानूनी प्रक्रिया का पालन करना होता है:
नोटिस भेजना
चेक बाउंस होने के 30 दिनों के भीतर चेक धारक को चेक जारीकर्ता को एक कानूनी नोटिस भेजना आवश्यक है। यह नोटिस रजिस्टर्ड डाक से भेजा जाना चाहिए।
15 दिनों की प्रतीक्षा अवधि
नोटिस भेजने के बाद, चेक जारीकर्ता को भुगतान करने के लिए 15 दिनों का समय दिया जाता है। यदि इस अवधि में भुगतान हो जाता है, तो मामला समाप्त हो जाता है।
शिकायत दर्ज करना
यदि 15 दिनों में भुगतान नहीं होता है, तो पीड़ित पक्ष मजिस्ट्रेट की अदालत में शिकायत दर्ज कर सकता है। यह शिकायत नोटिस भेजने की तारीख से 30 दिनों के भीतर दर्ज की जानी चाहिए।
चेक बाउंस से बचाव के उपाय
चेक जारी करने वालों को निम्नलिखित सावधानियां बरतनी चाहिए:
खाते में पर्याप्त बैलेंस: हमेशा सुनिश्चित करें कि चेक जारी करते समय आपके खाते में पर्याप्त राशि हो।
चेक विवरण की जांच: चेक पर तारीख, राशि, और हस्ताक्षर सही से भरे हों।
खाता सक्रिय रखें: सुनिश्चित करें कि आपका खाता सक्रिय है और किसी कारणवश बंद नहीं हुआ है।
SMS अलर्ट सक्रिय करें: बैंक से SMS अलर्ट सेवा चालू रखें ताकि खाते की स्थिति की जानकारी मिलती रहे।
डिजिटल भुगतान का विकल्प
आजकल UPI, NEFT, RTGS, और अन्य डिजिटल भुगतान माध्यम उपलब्ध हैं जो चेक से अधिक सुरक्षित और तेज हैं। ये माध्यम चेक बाउंस की समस्या से बचने का एक अच्छा विकल्प प्रदान करते हैं। RBI भी डिजिटल भुगतान को प्रोत्साहित कर रहा है ताकि वित्तीय लेन-देन अधिक सुरक्षित और पारदर्शी हो सके।
चेक बाउंस और क्रेडिट स्कोर
बार-बार चेक बाउंस होना आपके क्रेडिट स्कोर पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकता है। बैंक ऐसे ग्राहकों को जोखिमपूर्ण मानते हैं और भविष्य में लोन या क्रेडिट कार्ड देने में संकोच कर सकते हैं। इसलिए वित्तीय अनुशासन बनाए रखना अत्यंत आवश्यक है।
निष्कर्ष
चेक बाउंस एक गंभीर वित्तीय और कानूनी मामला है। RBI के दिशानिर्देश और नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट की धारा 138 इस समस्या से निपटने के लिए मजबूत कानूनी ढांचा प्रदान करते हैं। चेक जारी करने वालों को सावधानी बरतनी चाहिए और खाते में पर्याप्त बैलेंस बनाए रखना चाहिए। वहीं, यदि आपका चेक बाउंस हो जाता है, तो कानूनी प्रक्रिया का सही तरीके से पालन करना महत्वपूर्ण है।
डिजिटल युग में, डिजिटल भुगतान विधियों का उपयोग करना एक बेहतर विकल्प हो सकता है जो सुरक्षित, तेज और अधिक पारदर्शी है। वित्तीय अनुशासन और जिम्मेदारी से ही हम चेक बाउंस जैसी समस्याओं से बच सकते हैं और एक स्वस्थ वित्तीय प्रणाली का निर्माण कर सकते हैं।










